Tuesday, June 9, 2009

बंद आंखों से खोज

कल रात मैंने
भगवान् से शिकायत की
कि धरती पर
प्यार,विश्वास,
सुख-शान्ति का एहसास
क्यों समाप्त हो रहा है?
जहाँ देखो
दुःख,चीत्कार
शत्रुता का अन्धकार
क्यों व्याप्त हो रहा है?
वो बोले-
ऐसा नही
कि धरती
प्रेम और विश्वास से
विहीन हो गई है,
बस तुम्हारी आँखें
उसे पहचानने के लिए
क्षीण हो गई हैं
एक माँ,
संतान को खाता देख,
अपना पेट भर लेती है,
उसको हंसता देख,
ख़ुद के सारे सपने
पूरे कर लेती है
मन ही मन खुश रहती है
बिना किसी कारण ,
इससे ज्यादा क्या होगा
प्रेम का उदाहरण
जब रोता हुआ
एक बच्चा
माँ के पास आकर
चुप हो जाता है,
उसके कंधे से चिपक
आँचल कीखुशबु में
सो जाता है
ध्यान से देखो
फेंककर अज्ञान-चोगा ,
बोलो
इससे बड़ा
शान्ति दृश्य
और क्या होगा
नन्हे बालक को
उसका पिता
हवा में उछालता है ,
नन्हा बच्चा
हंसकर
किलकारियां मारता है
गिरने के भय का
उसे तनिक भी
ना एहसास होता है,
क्योंकि
पिता वापस पकड़ लेगा
उसे विश्वास होता है
अब समझे?
जो तुम सोचते थे
वह भ्रान्ति है,
धरती पर
अभी भी
प्रेम,विश्वास और शान्ति है
जो देखना चाहते हो ,
उसे अपने दिल में रखो ,
आंखों में बसाओ
तभी देख पाओगे ,
गर मन में हो अन्धकार ,
आँखें हो बंद ,
तो धरा पर
रौशनी कैसे खोज लाओगे ?
तो धरा पर
रौशनी कैसे खोज लाओगे ?

2 comments:

  1. This is evocative of all good that is left in the world.

    Lovely!

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  2. जो देखना चाहते हो ,
    उसे अपने दिल में रखो ,
    आंखों में बसाओ
    तभी देख पाओगे ,
    गर मन में हो अन्धकार ,
    आँखें हो बंद ,
    तो धरा पर
    रौशनी कैसे खोज लाओगे ?
    तो धरा पर
    रौशनी कैसे खोज लाओगे ?

    sundar bahut sundar.
    lagtaa hai bahut kuchh padhne ko milega isiliye folower ban rahaa hoon

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